परिसीमन विधेयक, 2026 के तहत आंध्र प्रदेश को लगभग किसी भी अन्य राज्य से अधिक संसदीय सीटें मिलने जा रही हैं, फिर भी राज्य के राजनीतिक वर्ग की प्रतिक्रिया उत्साह से ज़्यादा सतर्कता भरी रही है।
संसद में विचाराधीन इस विधेयक के अनुसार, सदन का कुल आकार राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ने के साथ आंध्र प्रदेश की लोकसभा सीटें 25 से बढ़कर 38 हो जाएंगी — यानी करीब 50 प्रतिशत की वृद्धि। काग़ज़ पर यह उस राज्य के लिए बड़ी बढ़त है, जो 2014 में तेलंगाना के अलग होने के बाद एक दशक से अधिक समय से अपनी राजनीतिक और प्रशासनिक पहचान फिर से गढ़ रहा है।
अधिकारियों और विश्लेषकों के अनुसार असली पेच निरपेक्ष संख्या में नहीं, बल्कि सापेक्ष भार में है। चूँकि तेज़ी से बढ़ती आबादी वाले उत्तरी राज्यों की सीटें और भी अधिक तेज़ी से बढ़ रही हैं, इसलिए बढ़े हुए सदन में आंध्र प्रदेश का कुल हिस्सा मुश्किल से हिलता है — करीब 4.60 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 4.65 प्रतिशत।
इसी वजह से राज्य के नेता इसे एकतरफ़ा लाभ मानने से बच रहे हैं और परिसीमन की व्यापक प्रक्रिया में दक्षिण भारत के प्रतिनिधित्व को लेकर सतर्क बने हुए हैं।
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