भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दंडनीय हत्या, किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत ‘जघन्य अपराध’ की श्रेणी में आती है, सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस प्रावधान में स्पष्ट रूप से न्यूनतम सजा न बताई गई हो, फिर भी आजीवन कारावास इसकी अंतर्निहित न्यूनतम सजा है।
मामले की पृष्ठभूमि
एक अन्य बच्चे की हत्या के आरोपी 16 वर्षीय किशोर पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलाया जाए या नहीं, इस सवाल पर न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और उज्जल भुइयां की पीठ सुनवाई कर रही थी। इस फैसले को बरकरार रखते हुए पीठ ने देशभर के किशोर न्याय बोर्डों (जेजेबी) के लिए यह तय करने के सिद्धांत निर्धारित किए कि आरोपी नाबालिग पर किशोर के रूप में मुकदमा चले या वयस्क के रूप में, इसका फैसला प्रारंभिक आकलन में कैसे किया जाए।
मुख्य कानूनी तर्क
न्यायमूर्ति पारदीवाला ने फैसले में लिखा कि चूंकि धारा 302 के तहत दोषी पाए जाने पर अदालतें आजीवन कारावास से कम सजा नहीं दे सकतीं, इसलिए हत्या के लिए आजीवन कारावास स्वाभाविक रूप से न्यूनतम सजा है — जिससे यह अधिनियम के तहत ‘जघन्य अपराध’ की श्रेणी में आ जाता है, जो कुछ परिस्थितियों में 16 से 18 वर्ष के आरोपियों पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलाने की अनुमति देता है।
यह क्यों मायने रखता है
यह फैसला देशभर के किशोर न्याय बोर्डों को आरोपी नाबालिग की मानसिक व शारीरिक क्षमता और अपराध की परिस्थितियों का आकलन करने के लिए स्पष्ट, बाध्यकारी दिशानिर्देश देता है — यही तय करता है कि हत्या के आरोप में किशोर पर किशोर न्याय प्रणाली में मुकदमा चलेगा या वयस्क आपराधिक न्याय प्रणाली में, जिनके सजा के नतीजे बेहद अलग होते हैं।
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