भारत के मौसम विभाग ने इस बार सामान्य से कठिन मानसून का संकेत दिया है। विभाग के अनुसार जून से सितंबर तक की बारिश सामान्य से कम — दीर्घावधि औसत के करीब 90 से 95 प्रतिशत — रहने की संभावना है। जिस देश में खेती, पेयजल और यहाँ तक कि बिजली भी काफ़ी हद तक मानसून पर निर्भर है, वहाँ इस पूर्वानुमान के असर मौसम के आँकड़ों से कहीं आगे तक जाते हैं।
चिंता का केंद्र अल नीनो की संभावित वापसी है — प्रशांत महासागर के गर्म होने का वह पैटर्न, जो ऐतिहासिक रूप से कमज़ोर भारतीय मानसून से जुड़ा रहा है। पूर्वानुमानकर्ताओं को देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम बारिश की आशंका है, हालाँकि उत्तर-पश्चिम, पूर्वोत्तर और पूर्वी प्रायद्वीपीय भारत के कुछ हिस्सों में कुछ राहत मिल सकती है।
मानसून पहले ही मुंबई, तेलंगाना, ओडिशा और मध्य व पूर्वी भारत के बड़े हिस्सों तक पहुँच चुका है, लेकिन असली चिंता कुल बारिश की मात्रा को लेकर है, न कि उसके समय को लेकर।
विशेषज्ञों का कहना है कि कमज़ोर मानसून ग्रामीण आय, खाद्य क़ीमतों और जलाशयों के स्तर पर दबाव डाल सकता है।
प्रातिक्रिया दे