Opinion

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ ने मोदी सरकार को कैसे हिला दिया

बीते बारह साल में मोदी सरकार को सबसे बड़ी चुनौती किसी विपक्षी पार्टी, किसी गठबंधन या किसी मंझे हुए नेता से नहीं मिली। वह एक मज़ाक से आई। मई में एक ऑनलाइन पैरोडी के तौर पर जन्मी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) ने वह कर दिखाया, जो भारत का बिखरा हुआ विपक्ष सालों से नहीं कर पाया — एक आत्मविश्वास से भरी सरकार को हिला देना और उसे पीछे हटने पर मजबूर कर देना।

इसकी शुरुआत का तरीका भी दिलचस्प है। जब ख़बरों के मुताबिक़ भारत के मुख्य न्यायाधीश ने बेरोज़गार युवाओं को “कॉकरोच” और “परजीवी” कहा, तो बेरोज़गारी, परीक्षा घोटालों और इस एहसास से थकी एक पूरी पीढ़ी — कि सत्ता में बैठा कोई उनकी नहीं सुन रहा — ने उसी अपमान को अपना तमगा बना लिया। कुछ ही दिनों में सत्तारूढ़ बीजेपी के नाम का मज़ाक उड़ाती इस ‘पार्टी’ के इंस्टाग्राम पर 2 करोड़ से ज़्यादा फ़ॉलोअर हो गए, जो बड़ी पार्टियों से भी आगे निकल गए। जिस अपमान से उन्हें छोटा दिखाना था, वही उनका झंडा बन गया।

यह आंदोलन सत्ता-तंत्र के लिए इसलिए ख़तरनाक है, क्योंकि इससे लड़ना ही मुश्किल है। इस पर हमला करने के लिए न कोई एक विचारधारा है, न कुरेदने के लिए कोई पुराना रिकॉर्ड, न मज़ाक उड़ाने के लिए कोई वंश। लीक हुए परीक्षा पेपर, ग़ायब होती नौकरियाँ, जवाबदेही का अभाव — ये पार्टीबाज़ी के नारे नहीं, भारतीय युवाओं की रोज़मर्रा की ज़िंदगी हैं। सरकार ने जब इसे ‘शोर’ कहकर टालना चाहा, तो शोर और बढ़ गया; और जब जंतर-मंतर के धरने के थम जाने का इंतज़ार किया, तो धरना ख़त्म होने को तैयार ही नहीं हुआ।

इस्तीफ़ा, जो सबसे बड़ा पैमाना है

इस आंदोलन की ताक़त का सबसे साफ़ पैमाना है वह इस्तीफ़ा, जो उसने करवाया। इतनी मज़बूत सरकारें आसानी से पीछे नहीं हटतीं, और उन लोगों के आगे तो बिल्कुल नहीं जिनके पास न कोई औपचारिक संगठन है, न पैसा, न किसी बैलट पर जगह। फिर भी शिक्षा मंत्री को पद छोड़ना पड़ा, और सरकार उसी आंदोलन के साथ मेज़ पर बैठी जिसे कभी वह हाथ के इशारे से टाल देती। आधिकारिक तौर पर चाहे जो कहा जाए, क्रम साफ़ है — सड़क से दबाव, फिर ऊपर से रियायत।

ख़ासकर सत्तारूढ़ पार्टी में इसे एक गुज़रते तूफ़ान की तरह देखने का लालच है — एक वायरल पल, जो ख़बरों का दौर बदलते ही ठंडा पड़ जाएगा। लेकिन यह सोच असल बात से चूक जाती है। CJP एक पार्टी से ज़्यादा एक लक्षण है। यह तब होता है जब एक बड़ी, युवा, आपस में जुड़ी आबादी यह मान लेती है कि राजनीति के आम रास्ते अब काम करना बंद कर चुके हैं। व्यंग्य इसलिए ज़रिया बना, क्योंकि गंभीर रास्ते बंद महसूस हो रहे थे।

असली इम्तिहान

इसका मतलब यह नहीं कि यह आंदोलन एक पूरी तरह तैयार राजनीतिक ताक़त बन चुका है। ग़ुस्से पर टिके आंदोलनों को बनाए रखना बेहद मुश्किल होता है; जो अनुशासन धरना जिताता है, वह अनुशासन संस्था नहीं बनाता, और जिस चीज़ का वह मज़ाक उड़ाता है, वही बनने की कोशिश में एक कैरिकेचर अपनी धार खो सकता है। पैसा, तंत्र, अगला चुनाव — सारी कमान अब भी सरकार के हाथ में है। अगर वह सिर्फ़ छवि सँभालने के बजाय असली शिकायतों को हल करे, तो इस ग़ुस्से को समेटा जा सकता है।

पर यही तो इम्तिहान है। बीते हफ़्तों का सबक़ यह नहीं कि कोई हैशटैग सरकार गिरा सकता है — वह नहीं गिरा सकता। सबक़ यह है कि इतनी बड़ी सरकार को भी एक बार सिहरने पर मजबूर किया जा सकता है, और वह सिहरन उसके विरोधियों से नहीं, उन नागरिकों से आई जिन पर वह शासन करती है। एक अपमान को गले लगाकर शुरू हुए इस आंदोलन ने सत्ता में बैठे लोगों को वह बात याद दिला दी जिसे भूलना उन्हें रास आने लगा था — कि बहुमत सहमति नहीं होता; और जो पीढ़ी ख़ुद को अनसुना महसूस करती है, वह आख़िरकार अपनी आवाज़ सुनवाने का रास्ता ढूँढ ही लेती है — चाहे उसके लिए ख़ुद को ‘कॉकरोच’ ही क्यों न कहना पड़े।

इसमें व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *